वेदों की जानकारी

वेद मानव सभ्यता के लगभग सबसे पुराने लिखित दस्तावेज हैं।  भारत का प्राचीन इतिहास की जानकारी का काफी भाग वेद से मिल जाती है.वेदों की रचना किसी एक व्यक्ति विशेष ने नहीं किया था. वेदों को अपौरुषेय (जिसे कोई व्यक्ति न कर सकता हो, यानि ईश्वर कृत) माना जाता है। माना जाता है कि यह ज्ञान विराटपुरुष से व  कारणब्रह्म से श्रुतिपरम्परा के माध्यम से सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी ने प्राप्त किया था । इन्हें श्रुति भी कहते हैं जिसका अर्थ है 'सुना हुआ ज्ञान'। प्राचीन कालके ब्रह्मा,वशिष्ठ ,शक्ति,पराशर, वेदव्यास ,जैमिनी याज्ञवल्क्यकात्यायन इत्यादि ऋषियोंको वेदोंका अच्छाज्ञाता माना जाता है।
दरअसल वेदों की रचना किसी एक काल में नहीं हुई। विद्वानों ने वेदों के रचनाकाल की शुरुआत 4500 ई.पू. से मानी है।  वेद अवतरण के पश्चात् काफी लम्बे काल तक श्रुति के रूप में रहे और काफी बाद में वेदों को लिपिबद्ध किया गया और वेदों को संरक्षित करने अथवा अच्छी तरहसे समझने के लिये वेदों  से ही वेदांगों  की रचना की गयी |
काफी समय तक कई विद्वानों द्वारा अलग अलग तरीके से वेदों की रचना की. ऐसा माना जाता है कि द्वापरयुग की समाप्ति के समय श्रीकृष्णद्वैपायन वेदव्यास जी ने यज्ञानुष्ठान के उपयोग को दृष्टिगत रखकर उस एक वेद के चार विभाग कर दिये और इन चारों विभागों की शिक्षा चार शिष्यों को दी। ये चार विभाग निम्नलिखित नाम से प्रचलित हैं.
 (1)ऋग्वेद, (2) यजुर्वेद, (3) सामवेद और (4) अथर्ववेद

ऋग्वेद
ऋग्वेद को चारों वेदों में सबसे प्राचीन माना जाता है। इसको दो प्रकार से बाँटा गया है। प्रथम प्रकार में इसे 10 मण्डलों में विभाजित किया गया है। मण्डलों को सूक्तों में, सूक्त में कुछ ऋचाएं होती हैं। कुल ऋचाएं 10520 हैं। दूसरे प्रकार से ऋग्वेद में 64 अध्याय हैं। आठ-आठ अध्यायों को मिलाकर एक अष्टक बनाया गया है। ऐसे कुल आठ अष्टक हैं। फिर प्रत्येक अध्याय को वर्गों में विभाजित किया गया है। वर्गों की संख्या भिन्न-भिन्न अध्यायों में भिन्न भिन्न ही है। कुल वर्ग संख्या 2024 है। प्रत्येक वर्ग में कुछ मंत्र होते हैं। सृष्टि के अनेक रहस्यों का इनमें उद्घाटन किया गया है। पहले इसकी 21 शाखाएं थीं परन्तु वर्तमान में इसकी शाकल शाखा का ही प्रचार है।
देवता सोम का उल्लेख ऋग्वेद के 9वें मंडल में है. उसी प्रकार चार प्रकार के वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र वर्ण) का उल्लेख ऋग्वेद के 10 वें मंडल में वर्णित पुरुष सूक्त है. इस वेद में इंद्र देवता पर सबसे अधिक श्लोक (250) हैं जबकि अग्नि देवता के लिए 200 श्लोक की रचना की गयी है. वामनावतार के तीन पगों द्वारा समूचे दुनिया को नाप लेने का आख्यान भी इसी वेद में है.

यजुर्वेद
इसमें गद्य और पद्य दोनों ही हैं। इसमें यज्ञ कर्म की प्रधानता है। प्राचीन काल में इसकी 101 शाखाएं थीं परन्तु वर्तमान में केवल पांच शाखाएं हैं - काठक, कपिष्ठल, मैत्रायणी, तैत्तिरीय, वाजसनेयी। इस वेद के दो भेद हैं - कृष्ण यजुर्वेद और शुक्ल यजुर्वेद। कृष्ण यजुर्वेद का संकलन महर्षि वेद व्यास ने किया है। इसका दूसरा नाम तैत्तिरीय संहिता भी है। इसमें मंत्र और ब्राह्मण भाग मिश्रित हैं। शुक्ल यजुर्वेद - इसे सूर्य ने याज्ञवल्क्य को उपदेश के रूप में दिया था। इसमें 15 शाखाएं थीं परन्तु वर्तमान में माध्यन्दिन को जिसे वाजसनेयी भी कहते हैं प्राप्त हैं। इसमें 40 अध्याय, 303 अनुवाक एवं 1975 मंत्र हैं। अन्तिम चालीसवां अध्याय ईशावास्योपनिषद है।

सामवेद
यह गायन ग्रन्थ है। इसमें गान विद्या का भण्डार है, यह भारतीय संगीत का मूल है। ऋचाओं के गायन को ही साम कहते हैं। इसकी 1001 शाखाएं थीं। परन्तु आजकल तीन ही प्रचलित हैं - कोथुमीय, जैमिनीय और राणायनीय। इसको पूर्वार्चिक और उत्तरार्चिक में बांटा गया है। पूर्वार्चिक में चार काण्ड हैं - आग्नेय काण्ड, ऐन्द्र काण्ड, पवमान काण्ड और आरण्य काण्ड। चारों काण्डों में कुल 640 मंत्र हैं। फिर महानाम्न्यार्चिक के 10 मंत्र हैं। इस प्रकार पूर्वार्चिक में कुल 650 मंत्र हैं। छः प्रपाठक हैं। उत्तरार्चिक को 21 अध्यायों में बांटा गया। नौ प्रपाठक हैं। इसमें कुल 1225 मंत्र हैं। इस प्रकार सामवेद में कुल 1875 मंत्र हैं। इसमें अधिकतर मंत्र ऋग्वेद से लिए गए हैं। इसे उपासना का प्रवर्तक भी कहा जा सकता है।

अथर्ववेद
इसमें गणित, विज्ञान, आयुर्वेद, समाज शास्त्र, कृषि विज्ञान, आदि अनेक विषय वर्णित हैं। कुछ लोग इसमें मंत्र-तंत्र भी खोजते हैं। यह वेद जहां ब्रह्म ज्ञान का उपदेश करता है, वहीं मोक्ष का उपाय भी बताता है। इसे ब्रह्म वेद भी कहते हैं। इसमें मुख्य रूप में अथर्वण और आंगिरस ऋषियों के मंत्र होने के कारण अथर्व आंगिरस भी कहते हैं। यह 20 काण्डों में विभक्त है। प्रत्येक काण्ड में कई-कई सूत्र हैं और सूत्रों में मंत्र हैं। इस वेद में कुल 5977 मंत्र हैं। इसकी आजकल दो शाखाएं शौणिक एवं पिप्पलाद ही उपलब्ध हैं। अथर्ववेद का विद्वान् चारों वेदों का ज्ञाता होता है। यज्ञ में ऋग्वेद का ज्ञाता  देवों का आह्नान करता है, सामवेद का उद्गाता सामगान करता है, यजुर्वेद का ज्ञाता अध्वर्यु देव:कोटीकर्म का वितान करता है तथा अथर्ववेद का ज्ञाता ब्रह्मण पूरे यज्ञ कर्म पर नियंत्रण रखता है। रोग निवारण, तंत्र-मन्त्र, जादू-टोना, श्राप, वशीकरण , विवाह, प्रेम , राजकर्म, मातृभूमि आदि विषयों पर उल्लेख अथर्ववेद में ही है.इसी भाग में सभा और समिति को प्रजापति की दो पुत्रियाँ बताया गया है.

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